Saturday, October 18, 2008

चुनाव का टिकट

बंद एसी कमरे में
चिंतन धीर गम्भीर
बाहर खड़े candidate
हो रहे अधीर

किराये पर बुलाये
दिखा रहे आँखे
छुटभहिये नेता
इधर उधर झांके

सफ़ेद पोशो की आड़ में
नगर वधुओं की टोली
मचा हुआ घमासान
जबरन चंदा वसूली

मिल जाए टिकट
तो भाग्य खुल जायेंगे
हार भी गए
पैसा ब्याज पर चलाएंगे

12 comments:

ताऊ रामपुरिया said...

मिल जाए टिकट
तो भाग्य खुल जायेंगे
हार भी गए
पैसा ब्याज पर चलाएंगे
बधाई मकरंद सर छा गए !

भूतनाथ said...

हां हां हां भूतनाथ चुनाव नही लडेगा ! हमारे ऊपर भी एक कविता लिखो नाश्ते में ! :) भूख लगी है !

प्रदीप मानोरिया said...

बधाई मकरंद जी वर्तमान (कु)राजनीति का यथार्थ चित्रण

विक्रांत बेशर्मा said...

मिल जाए टिकट
तो भाग्य खुल जायेंगे
हार भी गए
पैसा ब्याज पर चलाएंगे

मकरंद भाई , अच्छी उतारी आपने सफेदपोशों की ....आपके व्यंग का टशन बरक़रार रहे यही शुभकामना है !!!!!

विक्रांत बेशर्मा said...

मिल जाए टिकट
तो भाग्य खुल जायेंगे
हार भी गए
पैसा ब्याज पर चलाएंगे

मकरंद भाई , अच्छी उतारी आपने सफेदपोशों की ....आपके व्यंग का टशन बरक़रार रहे यही शुभकामना है !!!!!

राज भाटिय़ा said...

मिल जाए टिकट
तो भाग्य खुल जायेंगे
हार भी गए
पैसा ब्याज पर चलाएंगे
बहुत ही सुंदर
धन्यवाद

ghughuti said...

अच्छा लिखा है। अभी कुछ ही कविताएँ पढ़ पाई हूँ। विषय वस्तु का चुनाव बढ़िया है। एक बात जो परेशान कर रही है वह है वर्तनी की अशुद्धियाँ । क्षमा कीजिए, परन्तु न चाहते हुए भी ध्यान उस ओर चला जाता है। आशा है आप अन्यथा न लेंगे।
घुघूती बासूती

yamaraaj said...

किराये पर बुलाये
दिखा रहे आँखे
छुटभहिये नेता
इधर उधर झांके

badhiya rachana . dhanyawaad.

वर्षा said...

इनकी तो दुकान चलती रहेगी। खूब कही।

समयचक्र - महेद्र मिश्रा said...

किराये पर बुलाये
दिखा रहे आँखे
छुटभहिये नेता
इधर उधर झांके

vah bhai bahut badhiya . dhamaal machati achchi post hai . padhakar achcha laga. likhate rahiye. dhanyawad.

जितेन्द़ भगत said...

चुनावी नाटक के पहले के दृश्‍य का यथार्थ वि‍वरण। बहुत सुंदर।

seema gupta said...

मिल जाए टिकट
तो भाग्य खुल जायेंगे
हार भी गए
पैसा ब्याज पर चलाएंगे
"ha ha ha ha ha ye to vo walee baat huee, charon ungleeyan ghee mey or sir kdaee mey.... good expressions"

Regards