Friday, December 5, 2008

महीने का किराना

बिना खाए पत्नी का ताना

हजम नही होता पति को खाना

देखकर इस महीने का किराना

हम ने पुछा
ये इंतनी वेराइटी की मोमबत्तियां !

इतने पोस्टर कलर और पेपर

क्या बच्चों के स्कूल में

प्रोजेक्ट के लिए लाया हे

बोली तुम

ठहरे दीया छाप ,

सामाजिक सरोकार तो मुझे निभाने हे

हर occassion पर क्या पहले बाज़ार जायुंगी !

कालोनी में पॉँच छे पके आम

हॉस्पिटल में हे

कम से कम दो तीन मोमबत्तियां

अभी लग जाएँगी

12 comments:

संदीप शर्मा Sandeep sharma said...

बेहतरीन रचना...
पर निचे वाली ""चिटठा जगत से जुगाड़ व्यंग की "" और भी शानदार...

रश्मि प्रभा said...

bahut hi badhiyaa

ताऊ रामपुरिया said...

कालोनी में पॉँच छे पके आम

हॉस्पिटल में हे

कम से कम दो तीन मोमबत्तियां

अभी लग जाएँगी


बहुत जोरदार मकरंद सर !

रामराम !

योगेन्द्र मौदगिल said...

जै राम जी की भाई........ चोक्खी कविता..

परमजीत बाली said...

क्या बात है!! बहुत बढ़िया!!

रंजना said...

waah ! sundar vyangya

Gyan Dutt Pandey said...

जबरदस्त संवेदना तो नहीं, जबरदस्त बजटिंग जरूर है। महीने की किराने की लिस्ट बनाना वाकई दूरंदेशी का काम है! :)

mehek said...

bahut hi badhiya:);)

seema gupta said...

बोली तुम

ठहरे दीया छाप ,

सामाजिक सरोकार तो मुझे निभाने हे

" mind blowing"

Regards

राज भाटिय़ा said...

कालोनी में पॉँच छे पके आम

हॉस्पिटल में हे
वाह क्या बात है,
हंसी रुके तो आप को टिपण्णी दुं
धन्यवाद

mala said...

बेहतरीन रचना...बधाईयाँ !

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

बहुत खूब मकरंद जी.