Tuesday, November 11, 2008

चन्दे का सांड

लोकतंत्र में चुनाव एक त्यौहार हें,हमने भी सोचा चन्दे का सांड पाल लें

सांड अब शहर में
आयेंगे ,
मुस्कुराएंगे ,
गायों से तमीज से पेश आयेंगे

अब तुम चाहो
तो ये चारा भी ,
तुम्हारे हाथों ,
खायेंगे

लोकतंत्र में ऐसा
अवसर हर बार आता हे
नतीजा आते ही
सांड ट्रैफिक कंट्रोलर हो जाता हे,

गायें सांड पालक के
खूटे से बंध जाएँगी
कमाई की इस से बेहतर
scheme क्या होगी .....................

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28 comments:

Rachna Singh said...

keep writing and write on varios topics this is a good one

मोहन वशिष्‍ठ said...

बहुत अच्‍छे महाराज अच्‍छा लिखा है और जो टाईटल आपने दिया है अच्‍छा है क्‍योंकि मैंने जैसे ही नजर डाली तो पढा संडे का चांद लेकिन ध्‍यान दिया तो पाया संडे का चांद नहीं बल्कि चन्‍दे का सांड है अच्‍छा लगा

ताऊ रामपुरिया said...

सांड अब शहर में
आयेंगे ,
मुस्कुराएंगे ,
गायों से तमीज से पेश आयेंगे


बहुत बढिया मकरंद सर !

जितेन्द़ भगत said...

सुंदर कवि‍ता, और मोहन जी की टि‍प्‍पणी मजेदार। आभार।

Udan Tashtari said...

चुनाव के मौके पर एकदम सटीक रचना!! बधाई.

सचिन मिश्रा said...

Bahut khub.

सौरभ कुदेशिया said...

jameeni halata ka ekdum satik vivran. accha laga pada kar

Ratan Singh Shekhawat said...

चुनाव के मौसम में सटीक | हमारे नेताओं का व्यवहार ही ऐसा ही है

seema gupta said...

सांड अब शहर में
आयेंगे ,
मुस्कुराएंगे ,
गायों से तमीज से पेश आयेंगे
ha ha ha ha ha ha ha cant imagine even, great sense of humour.

Regards

Suresh Chandra Gupta said...

बहुत सुंदर. लिखते रहिये. हंसाते रहिये.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

शहर में आयेंगे
चूना लगायेंगे
पॉँच साल तक
गायब हो जायेंगे!

सुनीता शानू said...

लोकतंत्र में ऐसा
अवसर हर बार आता हे
नतीजा आते ही
सांड ट्रैफिक कंट्रोलर हो जाता हे,

बिलकुल सही लिखा है...

रंजना [रंजू भाटिया] said...

सही चुनावी रंग में कविता लिखी है आपने ..बहुत अच्छी

विष्णु बैरागी said...

वर्तमान स्थितियों का वास्‍तविक चित्रण ।

Gyan Dutt Pandey said...

सांड़ जेण्टलमैन बनेंगे। एक टाई तो पहना दी जाये उन्हें पगहे की जगह!

mehek said...

गायें सांड पालक के
खूटे से बंध जाएँगी
कमाई की इस से बेहतर
scheme क्या होगी .....................
bahut khub kaha,isse behtar koi scheme nahi ho sakti

Dr.Bhawna said...

आपने मेरे ब्लॉग पर टिप्पणी की ...लाख दिमाग लगाया पर समझ ही नहीं पाई कि आप बुराई कर रहे हैं कि बड़ाई ...ना ही प्रथम पंक्ति का अर्थ समझ आया ना ही द्वितीय का ...थकहारकर आपके ब्लॉग पर आये तब सारा माज़रा समझ आया,
अच्छी रचना के लिये आपको बधाई...
अगर टिप्पणी देवनागरी में होती तो यूँ अर्थ का अनर्थ ना होता बुरा मत मानियेगा :)

स्वाति said...

वाह मकरंद जी

आपकी कविता पढ़ी ,अत्यन्त ही रोचक और व्यंग से भरपूर लगी । व्यंग में आपकी विशेष पकड़ है .

अजित वडनेरकर said...

बहुत खूब मकरंद भाई...
शानदार...बहुत बड़ी बात कह जाते हैं आप
बस, यूं ही के अंदाज़ में। जमाए रहिए बस, यूं ही...

sandhyagupta said...

Bahut chutila. Badhai.

योगेन्द्र मौदगिल said...

सटीक चिंतन सार्थकव सामयिक व्यंग्य के लिये बधाई

प्रदीप मानोरिया said...

बेहद सही ओब्सेर्वेशन है आपका सटीक और सार्थक ब्लॉग जगत से लंबे समय तक गायब रहने के लिए माफी चाहता हूँ अब वापिस उसी कलम के साथ मौजूद हूँ .

गिरीश बिल्लोरे "मुकुल" said...

बहुत सुंदर माहिर हो छा जाने में बधाईयां

BrijmohanShrivastava said...

बहुत करारी बात /जनता तो बेचारी गाय हमेशा से रही है /इस गाय की हमेशा से एक ही तमन्ना रही है की कोई इससे तमीज़ से पेश आए /आया है मौका एक दिन की बादशाहत का -जनता के राज में जनता को एक दिन राजा बनने का -एक दिन का ये राजा शराब पिएगा ,जेब में नोट होंगे ,मुह में पान होगा दिल में अरमान होगा =घर से वोट डालने कार से जायेगा और पैदल घर आयेगा -गड़बड़ की तो जान से जायेगा

विनय said...

मनोरंजक!

singhsdm said...

लोकतंत्र में ऐसा
अवसर हर बार आता हे
नतीजा आते ही
सांड ट्रैफिक कंट्रोलर हो जाता हे,
बात तो ठीक है मगर यह लोकतंत्र ही है जो हमारी उम्मीदों को कायम रखे है वरना हमारा हश्र भी फेल्ड स्टेट की तरह ही होता.....मगर फ़िर भी आपकी कविता लोकतंत्र के कर्णधारों को उनकी ज़िम्मेदारी का एहसास कराती है

Jimmy said...

Bouth Khub JI


nice blog dude!!!!!

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प्रदीप मानोरिया said...

बहुत खूब आपने अपने विचारों को सुंदर तरीके से व्यक्त किया है आपका मेरे ब्लॉग पर स्वागत है