Thursday, January 22, 2009

डॉग वॉच

डॉग कर रहे कैटवाक
कैट कर रही डॉग वॉच
कुछ नया कर दिखाना हे
न जमा विजातीय
सजातीय से काम चलाना हे
लीव इन का जमाना हे
विचारों को ,
सभ्यता , संस्कृति की लगाम दो
जवानी सिर्फ़ जिस्म की परेड नही हे
बुदापा इसे भी आना हे
जिस्म की नुमाइश के लिए
कई मंडियां हे
पगडंडियाँ हे
तुम इस रेम्प को सोसाईटी मत लायो

9 comments:

प्रभाकर पाण्डेय said...

यथार्थ और सटीक रचना। धन्यवाद।

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत लाजवाब मकरंद सर.

रामराम.

seema gupta said...

डॉग कर रहे कैटवाक
कैट कर रही डॉग वॉच
" ha ha ha ha shayad job exchange kr li hai aapas mey...great"

Regards

Gyan Dutt Pandey said...

यह तो रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में तुलसी बाबा के लिखे कलयुग वर्णन सरीखा हो गया!

रश्मि प्रभा said...

achhi hai........

योगेन्द्र मौदगिल said...

तुम इस रैंप को..........

भई वाह... बहुत बधाई इस सामयिकता को...

राज भाटिय़ा said...

डॉग कर रहे कैटवाक
कैट कर रही डॉग वॉच...
मकरंद जी बहुत सुंदर
धन्यवाद

प्रदीप मानोरिया said...

बहुत सुंदर तीखा धारदार व्यंग वाह वाह मकरंद जी
प्रदीप मनोरिया 09425132060
http://manoria.blogspot.com
http://kundkundkahan.blogspot.com

मनुज मेहता said...

डॉग कर रहे कैटवाक
कैट कर रही डॉग वॉच
कुछ नया कर दिखाना हे
न जमा विजातीय
सजातीय से काम चलाना हे


bahut khoob makarand bhai
bahut sateek aur vyangatmak