सामान खरीद कर ,
जब हमने बिल माँगा
दुकानदार ने आँख तरेरी
मुस्कुराके हमको टाँगा
जो पर्ची पर लिखा हे
वही सही हें
पक्का चाहिए तो
अलग से लगेंगे
और वारंटी गारंटी
हमारी जबान हें
बरखुरदार
ये हिंदुस्तान हें
खोटे सिक्के यहाँ
बड़ी गाडियों में चलते हें
तुम्हारे जेसे बस स्टैंड से
उतरकर हम से उलझते हे
आगे की सोचो
कागज तो सिर्फ खाता बही हे
जबान हिलाए गा
तो खाना मिल पायेगा
कागज के भरोसे
तू कोरा कागज ही रह जायेगा
ग़ज़ल: सँवारे क्यों
-
काम नहीं जो आने वाला, उसको कोई पुकारे क्यों।
बाज़ारों की इस बस्ती में, दिल को कोई निखारे क्यों॥
इस्तेमाल का दौर नया है, भोगें-फेंकें, चलो-टलो,
पीछे छोड़ा ज...
1 week ago

3 comments:
बहुते सही कहा मकरंद सर.
रामराम.
पर्ची तो मिेली! कल हमने केमिस्ट की बड़ी दुकान से दवा खरीदी और उसके लिफाफे पर ही जोड़ कर दिया था कीमत का! :)
achha vyang hai..
Post a Comment