बराक ओबामा आये
मुस्कुराये , हात मिलाया
सपत्नी सकुशल चले गए
आदर्श के पुतले
अभी यहाँ जिन्दा हे
कारगिल के शहीद शर्मिंदा हे
सारे ज़माने का थूका
हम चाट गए
लोकतंत्र के शेर
पानी पीने नए घाट गए
भांड अब इन्साफ कर रहे हैं
गनीमत हे सिर्फ शादी दिखाई
सुना हे इसमें भी टी आर पी का चक्कर हे
नगर वधुँ के लिए television नया अवसर हे
नयी दिशा , नया जमाना , नित नए पहनो ,
जो दिखेगा वो ही बिकेगा
ये तो अब ग्लोबल नारा हे
भारत अब खुल गया हे
ओबामा जी फिर से आयेगा
उधार जो वसूलना हे .......................... ,
मैं भी एक कवि बन पाता - कविता
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*[अनुराग शर्मा]*
चित्र व कविता: अनुराग शर्माआग तुम्हारे अन्तर की मैं
अपने दिल में जला पाता
दर्द पिरो सकता सीने में
मैं भी एक कवि बन पाता
अन्धियारी यह रात...
6 days ago







2 comments:
... bahut badhiyaa !!!
बहुत दिन से कुछ लिख क्यों नहीं रहे ...?
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