सामजिक पीकदान
के कारण,
कई अभिलाषाएं , कई प्रतिभाएं ,
कुर्बान
पुरूष खोलता हे
कपडों की डोरियाँ मुस्कुराकर ,
पर जकड देता हे मन को
परम्पराओ का आइना दिखा कर
मंदी में
सामजिक व्यवस्था हे
जननी का शरीर
सबसे सस्ता हे
नाखुश - हिंदी ग़ज़ल
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कामरेड नाखुश हैं हमसे, मंदिर-मस्जिद वाले भी
मज़दूरों के नेता नाखुश, नाखुश उनके लाले भी॥
नाशादों को शाद करूँ, यह सोच रहा हूँ कुछ दिन से
जले दिलों के इस जग मे...
1 week ago
