चुनावी समर में जब ये दम हिलाते हैं
बड़े खुबसूरत नजर आते हैं
माँ बहनों पर भौकनां तो दूर
ये अदब से खड़े हो जाते हैं
कायनात का करिश्मा कहिये
सूंघकर सही दूकान पहुँच जाते हैं
रहनुमाओं के लिए चन्दा
तुंरत इक्क्ठ्ठा कर पाते हैं
मौसम की तरह ये भी बेवफा हैं
लोकतंत्र को ये बहुत भाते हैं
ख़त्म होते ही चुनाव
सारे शहर को काटने लग जाते हैं
प्रकृति का नियम सरल है
दर बदर भटकते मौत को पाते हैं
वक्त बेरहम है दोस्त
पट्टा डालो तभी ये कंट्रोल में आते हैं
