तेरी स्याह जुल्फों में ढली शाम
आफताब की नव किरणों ने दस्तक बंद पलकों पर
नव उल्लास नव वर्ष
वो शरमाई , मुस्कुरायी
तड़फ से जो हमने थामा उसका हाथ
पड़ी डांट
बच्चे बड़े हो गए हे
चाय पी लो
सपने में भी जब हाथ थामोगे,
मेरा होगा
ख्वाबों की फ्रेम तुम रोज बदलते हो
पर तस्वीर मेरी ही रहेगी
सात जन्मो का ठेका हे प्यारे
तन्हाई के मजे तो सात फेरे लेते ही खत्म हो जाते हे
तुम्हारे जेसे भंवरे भूख लगते ही घर आते हे
और रहा इश्क का सवाल
तुम्हे नींद तो मेरी बाहोँ में आती हे
माशूका ठण्ड गुजरते ही पिघल जाती हे
हिंदी ग़ज़ल: अनुराग शर्मा
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द्वार प्रेम के खुले हुए हों, बंद झरोखे संशय के हों,
मिटते साये छल के दिल में, बीते कल के भय के हों।
साफ़ नज़र आती है मंज़िल, साफ़ नज़र है राहों की,
मिटने ह...
3 months ago
