कुत्तों की पंचायत में
कुतिया ने गुहार लगाई
अगर सारे ये सब मेरे भाई
तो में किसकी लुगाई
पंचायत में एक दहाड़
शेर बूढ़ा भी हो
जुगाली तो कर ही सकता हे
कुतिया शरमाई
फिर में जंगल ही चली जाती
कम से कम हनीमून तो मनाती
पंचायत से फिर एक दहाडा
हमारा हुक्म और तुम्हारी नाफ़रमानी
इस देस में अब नहीं बहता नदियों में पानी
जहरीले सापों खुद तो रेंग रहे हो
लोकतंत्र पर भी नजर हे
पर याद रहे
कालिया मर्दन भी हमारा शगल हे
साक्षात्कार
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तुम्हें निर्मल देखना चाहता हूँ मैं,
विशुद्ध रूप, न कोई आभूषण,
न प्रसाधन, न भूमिका, न रंग-रोगन
मात्र तुम, अपने अस्तित्व की प्रथम ध्वनि जैसी।
एक बार तुमसे मिल...
2 weeks ago
